शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

बसन्त ऋतु

गीतिका छन्द

ऐ बसन्ती पात पीले, हाथ पीले मैं चली,
बिछ गई रौनक सजीली, है छबीली हर कली ।

आम पर नव बौर आई, ठौर पाई रीत की,
रात कोयल गुनगुनाई, राग डोली प्रीत की ।

आ गए राजा बसन्ती, क्या छटा रस रूप की
मैं निराली संग हो ली, चिर सुहागिन भूप की ।

नाम मेरा सरस सरसों, बरस बीते मैं खिली,
देख निज राजा बसन्ती, पुलकती फूली फली ।

अब हवा में छैल भरती, गैल भरती नेह की,
ज्यों बढ़ाती धूप नन्दा, नव सुगन्धा देह की ।

रात भर चलती बयारें, टोह मारे बाज सी,
प्राण सेतू बह्म सींचें, आँख मींचे लाज सी ।

देस धानी प्रीत घोले, मीत बोले नैन में,
तन गुजरियाँ राह चलतीं, ढार मटकी चैन में ।

त्योंरियाँ छैला गुलाबी, यों चढ़ाता मान से,
धार से काँकर बजाता, मोह लेता गान से ।

करुणा सक्सेना

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

मनहरण

मन में उठा विराग
छल है ये जीव-राग
खोजने चली तो तेरे
द्वार तक जाऊँगी ।।

मुझको उबार दे या
मुझको डुबाले तू ही
तैरने चली तो तेरे
पार तक जाऊँगी ।।

मन तू करे हरण
प्रेम मैं करूँ वरण
समझी नही तो छन्द
सार तक जाऊँगी ।।

छोड़ साँसों का व्यापार
छेड़ दे तू ब्रह्म-तार
तेरी जीत को कन्हाई
हार तक जाऊंगी ।।




करुणा सक्सेना

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

घर

घर
केवल अस्थि है
यज्ञ करो !
रीत दो ताल को
हे मीन...
तुम मरो !
अंतड़ियों के घाव पर
धैर्य धरो,
घर केवल अस्थि है
यज्ञ करो !

बंदी है गति औ’
गति का परिहास हो
अश्व के अश्रु औ’
बेड़ियों का हास हो
मृत न हो
हो न मोक्ष
युक्ति की चाल धरो
घर केवल अस्थि है
यज्ञ करो !

शीत हो
निश्तेज हो
भेद दो श्वांस को
त्रास हो
रास हो
भाव का विध्वंस करो..
मृत न हो
हो न मोक्ष
ध्यान धरो... 
घर केवल अस्थि है
यज्ञ करो ।


करुणा सक्सेना

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

प्रेम

लिखीं हर कवि ने
प्रेम पगी कविताएं
अपने प्रारम्भिक दौर में
और बनाये सेतु
उतरने के लिए
महाकाव्य के पार !

शब्दों में बंधे भाव
और भावों में गुंथे
प्रेम में
कचियाए अनुभव
उतर आए
पतवार बनकर !

एक - एक चाप से
धर्म सिद्ध हुए
और दमक उठी प्रेमाग्नि
पहाड़ों के पार
नापते हुए
मीलों की यात्रा !

प्रेम में बिराजे
कुछ भगवान बनकर
कुछ एक भक्त हुए
और हम खड़े हैं
आज भी
तेरे द्वार
प्रेम में ।


करुणा सक्सेना

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

आवाज़

एक दिन
उम्र के ढलते पड़ाव पर
कुछ ठिठक कर
देखा मैंने मुड़कर
कई आवाज़ें खड़ी कतारबद्ध
बुला रहीं थीं मुझे...

इस पूरे जीवन में
सुन चुकी थी सब कुछ
फिर भी आसान न था
अनदेखा या अनसुना कर पाना 
आज भी..

समेटा अपने कदमों को 
रुख़ किया आवाज़ो का
मुलाकात हुई
पहली आवाज़ से

यह थी
अधूरे ख्वाब की आवाज़
जिसे पाना न था
संसार का स्नेह 
न दौलत
न देह...
पर अधूरी थी कहीं
आवाज़ और मैं
दोनों ही
असमंजस में
आज भी पूरा न कर पाने की
बेबसी में बढ़ गयी कुछ आगे
अगली आवाज़ की ओर..

सुनी मैंनें
एक कलश चावल की आवाज़ 
और दख़ल था मेरा 
हर शय में...
उसका विराट फैलाव 
मेरी पहचान बना
जीवन और सघंर्ष की पहचान
जिसे कोई पहचान ही न पाया..

दुखी है कलश
अब कर पाने में भरपाई !

बढ़ी मैं फिर कुछ आगे 
खड़ी थी नज़रे झुकाए
मेरे मन की आवाज़...
घुट रही है आज भी
मेरे ही सामने 
असमर्थ सी
और लड़खड़ाती हुई..

सम्बल दिया
और बढ़ गई मैं
बेचैन आवाज़ों की
अन्तहीन यात्रा पर...


करुणा सक्सेना

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

तीसरा वनवास

छोर हो तुम
छोर हूँ मैं
बीच मे है बह रहा संघर्ष
फिर भी हर्ष
कि स्थिर हो तुम...
मैं तो अडिग हूँ राह में
कबसे मिलन की चाह में
पर बन्द ही होता नही
संघर्ष का बहना
कि छूटता ही है नही
जीवन का यह गहना
फिर भी बनी रहती है
मुझमें प्यास
है यह आस..
कितने कभी हो दूर
तो कितने कभी हो पास
कि ख़त्म ही होता नही
यह तीसरा वनवास ।

करुणा सक्सेना

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

शब्द

शब्द में भी द्वन्द है
मैं मुक्त हूँ कोई और हूँ
अश्रुओं की एक पंक्ति
या की निर्मल छोर हूँ...
जैसा इच्छुक वैसी सृष्टि
भाव भक्ति बोल दृष्टि
बज गया मुझमें
तो वह है अर्थ
और मैं शोर हूँ...
शब्द में भी द्वन्द है
मैं मुक्त हूँ कोई और हूँ ।

करुणा सक्सेना